Wednesday, 27 February 2013

ब्रम्हवृक्ष पलाश



ब्रम्हवृक्ष पलाश


पलाश को हिंदी में ढ़ाक, टेसू, बंगाली में पलाश, मराठी में पळस, गुजराती में केसुडा कहते है | इसके पत्त्तों से बनी पत्तलों पर भोजन करने से चाँदी – पात्र में किये भोजन तुल्य लाभ मिलते है |
‘लिंग पुराण’ में आता है कि पलाश की समिधा से ‘ॐ नम: शिवाय’ मंत्र द्वारा १० हजार आहुतियाँ दें तो सभी रोगों का शमन होता है |

पलाश के फुल : प्रेमह (मुत्रसंबंधी विकारों) में: पलाश-पुष्प का काढ़ा (५० मि.ली.) मिश्री मिलाकर पिलायें |

रतौंधी की प्रारम्भिक अवस्था में : फूलों का रस आँखों में डालने से लाभ होता है | आँखे आने पर (Conjunctivitis) फूलों के रस में शुद्ध शहद मिलाकर आँखों में आँजे |   

वीर्यवान बालक की प्राप्ति : एक पलाश-पुष्प पीसकर, उसे दूध में मिला के गर्भवती माता को रोज पिलाने से बल-वीर्यवान संतान की प्राप्ति होती है |

पलाश के बीज : ३ से ६ ग्राम बीज-चूर्ण सुबह दूध के साथ तीन दिन तक दें | चौथे दिन सुबह १० से १५ मि.ली. अरंडी का तेल गर्म दूध में मिलाकर पिलाने से कृमि निकल जायेंगे |

पत्ते : पलाश व बेल के सूखे पत्ते, गाय का घी व मिश्री समभाग मिला के धुप करने से बुद्धि की शुद्धि व वृद्धि होती है

बवासीर में : पलाश के पत्तों की सब्जी घी व तेल में बनाकर दही के साथ खायें |

छाल : नाक, मल-मूत्र मार्ग या योनि द्वारा रक्तस्त्राव होता हो तो छाल का काढ़ा (५० मि.ली.) बनाकर ठंडा होने पर मिश्री मिला के पिलायें |

पलाश का गोंद : पलाश का १ से ३ ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध या आँवला रस के साथ लेने से बल-वीर्य की वृद्धी होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं | यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है


The Eternal Tree: Palash (Butea Frondosa) 

Palash is known as Dhak and Tesu in Hindi, Palash in Bengali,  Palas in Marathi and  Kesuda in Gujrathi. Eating out of a plate made of Palash leaves gives the same benefits as are had from eating out of a silver plate.
Linga Purana says that all ailments can be prevented by giving 10000 oblations with Palash wood with japa of the mantra, ‘Aum Namah Shivay’ ॐ नम: शिवाय .

Palash Flowers : For any urinary problem, one can use with advantage extract of boiled Palash flowers (50 ml) mixed with sweet candy.
Put drops of Palash flowers juice in eyes at initial stage of night blindness. Palash flower juice mixed with pure honey may be applied to the eyes in case of Conjunctivitis.

For a Healthy and Robust Progeny : One Palash flower ground in milk should be given everyday to the expecting mother for a healthy and vigorous child.

Palash seeds: In case of worms, 3-6 grams of Palash seed powder may be given with milk for three consecutive days. On the fourth day 10-15 ml castor oil mixed in hot milk should be given to the patient. It will help remove worms from the body.

Leaves : Inhaling the fumes from burning the mixture of dry leaves of Palash and Bel ( the Bengal quince tree Aegle Marmelos), cow ghee and sugar candy mixed in equal quantity purifiles and hones the intellect.
In case of piles, prepare a dish of Palash leaves in ghee or oil and consume it with curds.

Palash bark : Prepare 50 gm. Extract by boiling Palash bark in water. Cool and add sugar candy to it. It is a useful therapy for bleeding from nose, urinary tract or uterus.

Palash wood resin (gum):1-3 grams of Palash resin taken with Amla juice or with milk sweetened by candied sugar strengthens the bones, fortifies the body to make it healthy, robust and virile. Its gum mixed in hot water is a tested therapy in watery stool and chronic diarrhhoea.



- Rishi Prasad March 2013



अजीर्ण (Dyspesia)


अजीर्ण (Dyspesia)

    अजीर्ण रोग से पीड़ित रोगी को कई प्रकार के अन्य रोग भी हो जाते हैं तथा इस रोग को कई प्रकार के अन्य नामों से भी जाना जाता है जो इस प्रकार हैं- बदहजमी, मन्दाग्नि, अपच तथा अग्निमान्द्य। इस रोग का इलाज प्राकृतिक चिकित्सा से किया जा सकता है।

अजीर्ण  रोग होने के कारण:-

          अजीर्ण  रोग होने का सबसे प्रमुख कारण पेट में कब्ज बनना है।

अजीर्ण रोग होने के लक्षण:-
          अजीर्ण  रोग होने के कारण भोजन करने के बाद रोगी व्यक्ति का भोजन ठीक से नहीं पचता है, उसे खट्टी-खट्टी डकारे आने लगती है तथा उसका पेट फूलने लगता है। रोगी व्यक्ति के पेट में हल्का-हल्का दर्द होने लगता है, गले तथा हृदय में जलन होने लगती है, मुंह के अन्दर से पानी बाहर आने लगता है, जी-मिचलाने लगता है, दिल की धड़कन तेज हो जाती है, मलक्रिया बन्द हो जाती है। इसके अलावा दिमागी परेशानी, घबराहट तथा भूख न लगना आदि समस्याएं भी रोगी को हो जाती है।

अजीर्ण  रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार :-  

1. अजीर्ण रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को शुरू के 3 दिन कागजी नींबू के रस का सेवन कराके उपवास रखवाना चाहिए या फिर कुछ दिनों तक फलों का रस पिलाना चाहिए।
2. संतरा, गाजर तथा टमाटर के रस का अधिक मात्रा में सेवन करने से भी अर्जीण रोग ठीक हो जाता है।
3. अजीर्ण रोग से पीड़ित रोगी को 4-5 दिनों तक आवश्यकता से कम भोजन का सेवन करना चाहिए। सुबह के समय में एक मीठा सेब या फिर पका टमाटर, दोपहर के समय कोई उबाली हुई सब्जी तथा तीसरे पहर के समय में गाजर, टमाटर, अनानास का रस और रात के समय में थोड़ी-सी उबाली हुई सब्जी या फिर इन सभी चीजों का रस पीना चाहिए। इन दिनों में उपचार करने के साथ-साथ रोगी व्यक्ति को गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करनी चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
4. रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक उपवास रखना चाहिए तथा पाचनशक्ति को बढ़ाने के लिए सादा और साधारण भोजन करना चाहिए। इसके साथ-साथ रोगी को हल्का व्यायाम भी करना चाहिए।
5. अजीर्ण रोग को ठीक करने के लिए शुश्क तथा घर्षण स्नान करना चाहिए और इसके साथ-साथ हल्का व्यायाम भी करना चाहिए। यदि साधारण अर्जीण रोग है तो वह मात्र इतने उपचार से ही ठीक हो जाता है लेकिन जब यह रोग अधिक गंभीर, प्रबल तथा पुराना होता है उसे ठीक होने में कुछ समय लग सकता है।
प्रबल तथा पुराने अजीर्ण  रोग को निम्नलिखित प्राकृतिक चिकित्सा से ठीक किया जा सकता है :-
1. रोगी व्यक्ति को प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार बताए गए एप्सम साल्ट बाथ करना (गुनगुने पानी में नमक थोड़ा सा नमक मिलकर उस पानी से स्नान करने को एप्सम साल्ट बाथ कहते है।) चाहिए। प्रतिदिन गरम पानी में तौलिया भिगोकर उस तौलिए से पेट की मांसपेशियों की कुछ मिनटों तक सिंकाई करनी चाहिए। इस क्रिया को करने के साथ-साथ बीच-बीच में 3 से 4 मिनट तक ठंडे पानी में तौलिए को भिगोंकर सिंकाई करनी चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
2. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार अजीर्ण रोग को ठीक करने के लिए रात के समय में रोगी के पेड़ू पर गीली मिट्टी की पट्टी लगानी चाहिए।
3. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी की कमर पर गीली मिट्टी की पट्टी लगानी चाहिए।
4. रोगी व्यक्ति को भोजन करने से 30 मिनट पहले 1 गिलास ठंडे पानी में एक कागजी नींबू का रस मिलाकर पीना चाहिए। इससे अजीर्ण रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
5. यदि इस रोग से पीड़ित रोगी का अजीर्ण रोग बहुत ज्यादा गंभीर हो गया हो तो प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार रोगी व्यक्ति के पूरे शरीर को भीगी चादर की लपेट करना चाहिए फिर इसके बाद वाष्प स्नान करना चाहिए। इससे यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
6. अजीर्ण रोग को प्राकृतिक चिकित्सा से ठीक करने के लिए रोगी को उदरस्नान तथा मेहनस्नान करना चाहिए तथा इसके बाद गरम और ठण्डा पेट स्नान करना चाहिए। इस प्रकार से स्नान करना ज्यादा लाभकारी होता है।
7. रोगी व्यक्ति को 5 मिनट तक गरम पानी से उदर स्नान करने के बाद 3 मिनट तक ठंडे पानी से उदर स्नान करना चाहिए। इसके बाद इस क्रिया को प्रतिदिन कम से कम 3 से 4 बार दोहराना चाहिए।
8. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार धनुरासन और उत्थान पादासन क्रिया से अर्जीण रोग का इलाज करने से रोगी व्यक्ति जल्दी ही ठीक हो जाता है।
9. प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार अर्जीण रोग को ठीक करने के लिए नीली बोतल का सूर्यतप्त जल 25 मिलीलीटर की मात्रा में रोजाना 4 बार सेवन करने से रोगी व्यक्ति जल्दी ही ठीक हो जाता है।