Friday, 15 February 2013

शिव स्वरोदय(भाग-6)


शिव स्वरोदय(भाग-6)

सुषुम्ना नाड़ी

क्षणं वामे क्षणं दक्षे यदा वहति मारुतः।
सुषुम्ना सा च विज्ञेया सर्वकार्यहरा स्मृता।।124।।
अन्वय- यदा मारुतः क्षणं वामे क्षणं दक्षे वहति सा सुषुम्ना विज्ञेया सर्वकार्यहारा च स्मृता।124
भावार्थ- जब साँस थोड़ी-थोड़ी देर में बाँए से दाहिने और दाहिने से बाँए बदलने लगे तो समझना चाहिए कि सुषुम्ना नाड़ी चल रही है। इसी को शून्य स्वर भी कहा जाता है और यह सब कुछ नष्ट कर देता है।
English Translation- When breath changes from left to right and vice versa within seconds then we should understand that Sushumna Nadi is active. This also known as Shunya Swara and it is always harmful in undertaking any work other than spiritual practices.
तस्यां नाड्यां स्थितो वह्निर्ज्वलते कालरूपकः।
विषवत्तं विजानीयात् सर्वकार्यविनाशनम्।।125।।
अन्वय- तस्यां नाड्यां स्थितः वह्निः कालरूपकः ज्वलते, तं सर्वकार्य-विनाशनं विषवत्
विजानीयात्।125
भावार्थ- उस नाड़ी में अर्थात् सुषुम्ना में अग्नि तत्व का प्रवाह काल-रूप होता है। सभी शुभ और अशुभ कार्यों के फल को जलाकर भस्मीभूत कर देता है, अतएव इसे विष के समान समझना चाहिए।
English Translation- When fire factor (Agni Tattva) is active in Sushumna Nadi then it is great destroyer and burns results of all auspicious and inauspicious actions.
यदानुक्रममुल्लङ्घ्य यस्य नाडीद्वयं वहेत्।
तदा तस्य विजानीयादशुभं नात्र संशयः।।126।।
अन्वय- यदा यस्य नाडीद्वयं अनुक्रमम् उल्लङ्घ्य वहेत् तदा तस्य अशुभं विजानीयात्, अत्र न संशयः।126
भावार्थ- यदि किसी की चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी अपने क्रम में न प्रवाहित होकर एक ही नाड़ी काफी लम्बे समय तक प्रवाहित होती रहे तो समझना चाहिए कि उसका कुछ अशुभ होना है, इसमें कोई संशय नहीं है।
English Translation- In case breath does not flow through left and right nostril in proper order and it flows through only any one nostril for a log period, it should be understood that some thing wrong going to happen with him without any doubt.
क्षणं वामे क्षणं दक्षे विषमं भावमादिशेत्।
विपरीतं फलं ज्ञेयं ज्ञातव्यं च वरानने।।127।।
अन्वय- वरानने, क्षणं वामे क्षणं दक्षे भावं विषमम् आदिशेत्, ज्ञेयं फलं विपरीतं च ज्ञातव्यम्।127
भावार्थ- हे सुमुखि, जब क्षण-क्षण में बायीं और दाहिनी नाड़ियाँ अपना क्रम बदलती रहें तो ये विषम भाव की द्योतक होती हैं और उस समय किया गया कार्य आशा के विपरीत फल प्रदान करता है (पर आध्यात्मिक साधनाओं को छोड़कर)।
English Translation- O Beautiful Goddess, when breath flow in both the nostrils alternates within short period, the result of any work done during the period is always undesirable (here any work means other than spiritual practices).
उभयोरेव सञ्चार विषवत्तं विदुर्बुधैः।
न कुर्यात्क्रूरं सौम्यानि तत्सर्वं विफलं भवेत्।।128।।
अन्वय- (यदि) उभयोः सञ्चारः (भवति) बुधाः तं विषवत् विदुः, (अत एव) क्रूरं सौम्यानि न कुर्यात्। तत्सर्वं विफलं भवेत्।
भावार्थ- विद्वान लोग दोनों नाड़ियों का एक साथ प्रवाहित होना विष की तरह मानते हैं। अतएव उस समय क्रूर और सौम्य दोनों ही तरह के कार्यों को न करना ही उचित है। क्योंकि उनका वांछित फल नहीं मिलता है।
English Translation- The flow of breath through both the nostrils simultaneously has been considered very harmful. It has been therefore suggested not to start any auspicious or inauspicious work during that period, otherwise there will be undesired result.
जीविते मरणे प्रश्ने लाभालाभे जयाजये।
विषमे विपरीते च संस्मरेज्जगदीश्वरम्।।129।।
अन्वय- यह श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय नहीं दिया जा रहा है।
भावार्थ- सुषुम्ना के प्रवाह काल में जीवन, मृत्यु, लाभ, हानि, जय और पराजय आदि के प्रश्न पर ईश्वर का स्मरण करना चाहिए, अर्थात आध्यात्मिक साधना करना चाहिए।
English Translation- We should always do spiritual practices during the flow of Sushumna Nadi without thinking about life, death, profit, loss, victory and defeat.
ईश्वरे चिन्तिते कार्यं योगाभ्यासादिकर्म च।
अन्यतत्र न कर्त्तव्यं जयलाभसुखैषिभिः।।130।।
अन्वय- (सुषुम्नाप्रवाहकाले) जयलाभसुखैषिभिः ईश्वरे चिन्तिते योगाभ्यासादिकर्म च कार्यं, अन्यतत्र (किमपि) न कर्त्तव्यम्।
भावार्थ- सुषुम्ना नाड़ी के प्रवाह-काल में जय, लाभ और सुख चाहनेवाले को ईश्वर का चिन्तन और योगाभ्यासादि कर्म करना चाहिए, इसके अतिरिक्त कुछ भी नहीं करना चाहिए।
English Translation- The person, who is desirous of victory, profit and pleasure, should do only spiritual practices and nothing else.
सूर्येण वहमानायां सुषुम्नायां मुहुर्मुहुः।
शापं दद्याद्वरं दद्यात्सर्वथैव तदन्यथा।।131।।
अन्वय- यह श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय आवश्यक नहीं है।
भावार्थ- सूर्य स्वर के प्रवाह के बाद बार-बार सुषुम्ना के प्रवाहित होने पर न ही किसी को शाप देना चाहिए और न ही वरदान। क्योंकि इस स्थिति में सब निरर्थक होता है।
English Translation- In case, Sushumna Nadi flows now and then after Surya Nadi, we should neither curse anybody nor grant any boon. Because they become useless.
नाडीसङ्क्रमणे काले तत्त्वसङ्गमनेSपि च।
शुभं किञ्चन्न कर्त्तव्यं पुण्यदानानि किञ्चन।।132।।
अन्वय- श्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थ- स्वरों के संक्रमण और तत्त्वों के संक्रमण के समय अर्थात दो स्वरों और दो तत्त्वों के मिलन के समय कोई भी शुभ कार्य- पुण्य, दानादि कार्य नहीं करना चाहिए।
English Translation- During the transition of two Swaras and Tattvas one should not start any auspicious work.

विषमस्योदयो यत्र मनसाऽपि चिन्तयेत्।
यात्रा हानिकरो तस्य मृत्युः क्लेशो न संशयः।।133।।
अन्वय - श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय नहीं दिया जा रहा है।
भावार्थ - विषम स्वर के प्रवाह काल में यात्रा प्रारम्भ करने का विचार मन में उठने नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे यात्रा में कठिनाई तो आती ही है, हानि भी होती है। यहाँ तक कि मृत्यु भी हो सकती है।
English Translation- Here Visham Swar is nothing but Sushumna Nadi and therefore during the flow of breath through both the nostrils at a time, we should not think of starting any journey. Because it causes appearance great difficulties or losses or even death.
पुरो वामोर्ध्वतश्चन्द्रो दक्षाधः पृष्ठतो रविः।
पूर्णा रिक्ताविवेकोSयं ज्ञातव्यो देशिकैः सदा।।134।।
अन्वय- यह श्लोक भी लगभग अन्वित क्रम में है।
भावार्थ- यदि चन्द्र स्वर प्रवाहित हो रहा हो और कोई सामने से आए, बायें से आए अथवा ऊपर से या सामने, बायें या ऊपर की ओर विराजमान हो, तो समझना चाहिए कि उससे आपका काम पूरा होगा। इसी प्रकार जब सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो रहा हो, तो नीचे, पीछे अथवा दाहिने से आनेवाला या उक्त दिशाओं में विराजमान व्यक्ति आपको शुभ संदेश देगा या आपका काम पूरा करेगा। किन्तु यदि स्थितियाँ इनके विपरीत हों, तो देशिकों (आध्यात्मिक गुरुजनों) को समझना चाहिए कि वह काल बिलकुल रिक्त और अविवेकपूर्ण है, अर्थात कार्य में सफलता के लिए उचित समय नहीं है।
English Translation- During the flow of breath through left nostril if a person is coming from the left side, front or upside or he is sitting on the left, in the front or upside of you, communication with him will be always beneficial. In case of flow of breath through right nostril, the above directions should be considered as right, back and below side in place of left, front and upside. But in opposite conditions wises are suggested to consider the time not suitable for success.
ऊर्ध्ववामाग्रतो दूतो ज्ञेयो वामपथि स्थितः।
पृष्ठे दक्षे तथाSधस्तात्सूर्यवाहागतः शुभः।।135।।
अन्वय- (चन्द्रस्वरप्रवाहे) वामपथि ऊर्ध्ववामाग्रतः तथा (एव) सूर्यवाहे दक्षे पृष्ठे अधस्तात् स्थितः आगतः (वा) दूतः शुभः ज्ञेयः।
भावार्थ- पिछले श्लोक की ही भाँति इस श्लोक में भी वे ही बातें दूत के बारे में कही गयी हैं, अर्थात चन्द्र स्वर के प्रवाह काल में यदि कोई दूत बायें, ऊपर या सामने से आए अथवा सूर्य-स्वर के प्रवाह-काल में यदि वह दाहिने, नीचे या पीछे से आए तो समझना चाहिए कि वह कोई शुभ समाचार लाया है। ऐसा न हो तो विपरीत परिणाम समझना चाहिए।
English Translation- Like previous verse, a messenger coming from left side, front or upside during the flow of breath throw left nostril gives good news. Similarly, during the flow of right nostril breath messenger coming from right side, back or below gives good message. If it is opposite, the result will be bad.
अनादिर्विषमः सन्धिर्निराहारो निराकुलः।
परे सूक्ष्मे विलीयते सा संध्या सद्भिरुच्यते।।136।।
अन्वय- श्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थ- जब इडा और पिंगला स्वर एक-दूसरे में लय हो जाते हैं, तो वह समय बड़ा ही भीषण होता है। अर्थात् सुषुम्ना स्वर का प्रवाह-काल बड़ा ही विषम होता है। क्योंकि सुषुम्ना को निराहार और स्थिर माना गया है। वह सूक्ष्म तत्त्व में लय हो जाती है जिसे सज्जन लोग संध्या कहते हैं।
English Translation- When breath alternates from left to right and vice-versa that period is most inauspicious for any work (other than spiritual practices) because it is Sushumna and it is unmovable and it accepts nothing. It is absorbed by subtle Tattva and wises call it Sandhya, the transition period.
न वेदं वेद इत्याहुर्वेदो वेदो न विद्यते।
परमात्मा वेद्यते येन स वेदो वेद उच्यते।।137।।
अन्वय- वेदं न वेद इति आहुः वेदो न वेदः विद्यते, (अपितु) परमात्मा येन विद्यते स वेदो वेद उच्यते।
भावार्थ- ज्ञानी लोग कहते हैं कि वेद स्वयं वेद नहीं होते, बल्कि ईश्वर का ज्ञान जिससे होता है उसे वेद कहते हैं, अर्थात जब साधक समाधि में प्रवेश कर परम चेतना से युक्त होता है उस अवस्था को वेद कहते हैं।
English Translation- Wise men tell that Veda itself is not Veda (Knowledge), but it is that by which enlightenment is achieved, i.e. union of individual consciousness and Cosmic consciousness.
न संध्या संधिरित्याहुः संध्या संधिर्निगद्यते।
विषमः संधिगः प्राण स संधिजः संधिरुच्यते।।138।।
अन्वय- (रात्रिदिवसयोः) संधिः इति न संध्या आहुः, (इयं) संन्धिः (सामान्यरूपेण)
सन्ध्या निगद्यते, (अपितु) सः विषमः सन्धिगः सन्धिजः प्राणः सन्धिः
उच्यते।
भावार्थ दिन और रात का मिलन संध्या नहीं है, यह तो मात्र एक बाह्य प्रक्रिया है। वास्तविक संध्या तो सुषुम्ना नाड़ी में स्वर के प्रवाह को कहते हैं।
English Translation- Union of day and night is not the real evening, it is a mere phenomenon of nature. The real evening is flow of Sushumna, i.e. flow of breath through both the nostrils simultaneously.
देव देव महादेव सर्वसंसारतारक।
स्थितं त्वदीयहृदये रहस्यं वद मे प्रभो।।139।।
अन्वय यह श्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थ माँ पार्वती भगवान शिव से पूछती हैं हे देवाधिदेव, हे महादेव, हे जगत के उद्धारक, अपने हृदय में स्थित इस गुह्य ज्ञान के बारे में और अधिक बताने की कृपा करें।
English Translation – Goddess Parvati again asks Lord Shiva, O God of gods and Leading Authority for the universe beyond life and death, please tell me something more about the most secret knowledge lying in your heart.
स्वरज्ञानरहस्यात्तु न काचिच्चेष्टदेवता।
स्वरज्ञानरतो योगी स योगी परमो मतः।।140।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ - माँ पार्वती के ऐसा पूछने पर भगवान शिव बोले- हे सुन्दरि, स्वरज्ञान सर्वश्रेष्ठ और अत्यन्त गुप्त विद्या है एवं सबसे बड़ा इष्ट देवता है। इस स्वर-ज्ञान में जो योगी सदा रत रहता है, वह योगी सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
English Translation – In reply to the question put by the Goddess, Lord Shiva said, “O Beautiful Goddess, knowledge of Swara is the most secret knowledge in the creation and this is The Greatest Ishta Devata for every one. Therefore, the Yogi who is always practicing it without break is considered as the greatest Yogi.
पञ्चतत्त्वाद्भवेत्सृष्टिस्तत्त्वे तत्त्वं प्रलीयते।
पञ्चतत्त्वं परं तत्त्वं तत्त्वातीतं निरञ्जनः।।141।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।
भावार्थ पूरी सृष्टि पाँच तत्त्वों (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी) से ही रची गयी है और वह इन्हीं तत्त्वों में विलीन होती है। परम तत्त्व इन तत्त्वों से बिलकुल परे है और वह निरंजन है, अर्थात् अजन्मा है।
English Translation - The whole creation is created out of five Tattvas (ether, air, fire, water and earth) and it is absorbed in them. But The Supreme Being is beyond these Tattvas and therefore He is beyond the birth and the death.
तत्त्वानां नामविज्ञेयं सिद्धयोगेन योगिभिः।
भूतानां दुष्टचिह्नानि जानातीह स्वरोत्तमः।।142।।
अन्वय योगिभिः सिद्धयोगेन तत्त्वानां नामविज्ञेयम्। (सः) स्वरोत्तमः (योगी) भूतानां दुष्टचिह्नानि इह जानाति।
भावार्थ योगी लोग सिद्ध योग से तत्त्वों को जान लेते हैं। वे स्वरज्ञानी इन पंच महाभूतों के दुष्प्रभावों को भली-भाँति समझते हैं और इसलिए वे भी इनसे परे हो जाते हैं।
English Translation – Yogis know these Tattvas by the practice of advanced yogic techniques. These Swara-yogis therefore understand bad effects of these Tattvas and thereby they become able to go beyond them (Tattvas), i.e. they become God themselves.
पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च।
पञ्चभूतात्मकं विश्वं यो जानाति स पूजितः।।143।।
अन्वय यह श्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थपंच भूतों से निर्मित सृष्टि को तत्त्व के रूपों में, अर्थात पृथिवी, जल, तेज (अग्नि), वायु और आकाश को उनके सूक्ष्म रूपों में उन्हें जान लेता है, उनका साक्षात्कार कर लेता है, वह पूज्य बन जाता है।
English Translation - A person, who realizes this creation created out of five Tattvas (earth, water, fire, air and ether) at the different levels of their real existence, he is the real honourable authority in the world.
सर्वलोकस्थजीवानां न देहो भिन्नतत्त्वकः।
भूलोकसत्यपर्यन्तं नाडीभेदः पृथक् पृथक्।।144।।
अन्वयभूलोकात्सत्यपर्यन्तं सर्वलोकस्थजीवानां देहो न भिन्नतत्त्वकः, (परन्तु) नाडीभेदः पृथक् पृथक्।
भावार्थभूलोक से सत्यलोक तक सभी लोकों में अस्तित्व-गत देह में तत्त्व भिन्न नहीं होते, अर्थात् पाँच तत्त्वों से ही निर्मित होता है। लेकिन अस्तित्व प्रत्येक स्तर पर नाड़ियों का भेद अलग हो जाता है।
English Translation – At all the seven levels of consciousness, i.e. from earth to Satyalok, this creation is created out five Tattvas, but nadis are different.
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वामे वा दक्षिणे वाSपि उदयाः पञ्च कीर्तिताः।
अष्टधा तत्त्वविज्ञानं श्रृणु वक्ष्यामि सुन्दरि।।145।।
अन्वय - वामे वा दक्षिणे वाSपि उदयाः पञ्च कीर्तिताः, (अत एव) हे सुन्दरि, अष्टधा तत्त्वविज्ञानं श्रृणु वक्ष्यामि।
भावार्थभगवान शिव कहते हैं कि चाहे बाँया स्वर चल रहा हो या दाहिना, दोनों ही स्वरों के प्रवाह-काल के दौरान बारी-बारी से पंच महाभूतों का उदय होता है। हे सुन्दरि, तत्व-विज्ञान आठ प्रकार का होता है। उन्हें मैं बताता हूँ, ध्यान से सुनो।
English Translation – Lord Shiva says, “O Beautiful Goddess, five Tattvas (earth, water, fire, air and ether) appears in both Swaras, i.e. during the flow of breath either through left nostril or right nostril, one by one. There are eight levels of energy, I am telling you, listen them attentively.
प्रथमे तत्त्वसङ्ख्यानं द्वितीये श्वासन्धयः।
तृतीये स्वरचिह्नानि चतुर्थे स्थानमेव चः।।146।।
पञ्चमे तस्य वर्णाश्च षष्ठे तु प्राण एव च।
सप्तमे स्वादसंयुक्ता अष्टमे गतिलक्षणम्।।147।।
अन्वय ये दोनों श्लोक अन्वित क्रम में हैं, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।
भावार्थपहले भाग में तत्त्वों की संख्या होती है, दूसरे भाग में स्वर का मिलन होता है, तीसरे भाग में स्वर के चिह्न होते हैं और चौथे भाग में स्वर का स्थान आता है। पाँचवें भाग उनके (तत्त्वों के) वर्ण (रंग) होते हैं। छठवें भाग में प्राण का स्थान होता है। सातवें भाग में स्वाद का स्थान होता है और आठवें में उनकी दिशा।
English Translation – First level is the number of Tattvas, second is transition of Swaras, third is signs or indications of tattvas, fourth is their places, fifth is their colours, sixth is life energy, seventh is taste and eighth is their directions.
एवमष्टविधं प्राणं विषुवन्तं चराचरम्।
स्वरात्परतरं देवि नान्यथा त्वम्बुजेक्षणे।।148।।
अन्वय हे अमबुजेक्षणे देवि, एवमष्टविधं प्राणं चराचरं विषुवन्तम्, अत एव स्वरात्परतरन्तु नान्यथा (स्यात्)।
भावार्थ - हे कमलनयनी, इस प्रकार यह प्राण आठ प्रकार से सम्पूर्ण चर और अचर विश्व में व्याप्त है, अतएव स्वर-ज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई ज्ञान नहीं है।
English Translation – O Beautiful Goddess with good looking eyes like lotus, in this way this whole creation is comprised of the vital energy with eight levels, as stated above.
निरीक्षितव्यं यत्नेन सदा प्रत्यूषकालतः।
कालस्य वञ्चानार्थाय कर्म कुर्वन्ति योगिनः।।149।।
अन्वय – (अत एव) सदा प्रत्यूषकालतः यत्नेन निरीक्षितव्यम्। योगिनः कालस्य वञ्चानार्थाय कर्म कुर्वन्ति।
भावार्थअतएव तड़के उठकर भोर से ही यत्न पूर्वक स्वर का निरीक्षण करना चाहिए। इसीलिए काल के बन्धन से मुक्त होने के लिए योगी लोग स्वर-ज्ञान में विहित कर्म करते हैं, अर्थात् स्वर-ज्ञान के अन्तर्गत बताई गयी विधियों का अभ्यास करते हैं।
English Translation – Therefore this Swara is required to be observed immediately from getting up early in the morning, i.e. before sunrise. Yogis practice the techniques prescribed by this science. There is no superior knowledge other than the knowledge of Swara to get rid of the bondage of time factor.
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