Friday, 15 February 2013

शिव स्वरोदय(भाग-9)


शिव स्वरोदय(भाग-9)

स्वरज्ञानं धनं गुप्तं धनं नास्ति ततः परम्।
गम्यते तु स्वरज्ञानं ह्यनायासं फलं भवेत्।।214।।  
अन्वय श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव इसके अन्वय की आवश्यकता नहीं है।
भावार्थ- भगवान शिव कहते हैं कि हे देवि, स्वरज्ञान से बड़ा कोई भी गुप्त ज्ञान नहीं है। क्योंकि स्वर-ज्ञान के अनुसार कार्य करनेवाले व्यक्ति सभी वांछित फल अनायास ही मिल जाते हैं।
English Translation – Lord Shiva said, “O Goddess, there is no most secret knowledge in the world other than the science of breath (Swarodaya). Because one can get desired result by performing his work in his life according to the instructions given in it.”
श्री देव्युवाच
देव देव महादेव महाज्ञानं स्वरोदयम्।
त्रिकालविषयं चैव कथं भवति शंकर।।215।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ देवी भगवान शिव से कहती हैं- हे देवाधिदेव महादेव, आपने मुझे स्वरोदय का सर्वोच्च ज्ञान प्रदान किया। मुझे अब यह बताने की कृपा करें कि स्वरोदय ज्ञान के द्वारा कोई कैसे भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों काल का ज्ञाता हो सकता है।
English Translation – The Goddess said to Lord Shiva, “O God of gods, you initiated me in the highest knowledge of breath (Swarodaya). Now you are requested to tell me how one can have knowledge of present, past and future.”
ईश्वर उवाच
अर्थकालजयप्रश्नशुभाशुभमिति त्रिधा।
एतत्त्रिकालविज्ञानं नान्यद्भवति सुन्दरि।।216।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ - माँ पार्वती के इस प्रकार पूछने पर भगवान शिव ने कहा- हे सुन्दरि, काल के अनुसार सभी प्रश्नों के उत्तर तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है- विजय, सफलता और असफलता। स्वरोदय के ज्ञान के अभाव में इन तीनों को समझ पाना कठिन है।
English Translation – In reply to the question put forth by The Goddess, Lord Shiva said to her, “O Beautiful Goddess, all the time we need to know about victory, success and failure. We cannot know about these three aspects of our life without the knowledge of Swarodaya.”
तत्त्वे शुभाशुभं कार्यं तत्त्वे जयपराजयौ।
तत्त्वे सुभिक्षदुर्भिक्षे तत्त्वं त्रिपादमुच्यते।।217।।
अन्वय - तत्त्वं त्रिपादमुच्यते, तत्त्वे शुभाशुभं कार्यं तत्त्वे जयपराजयौ तत्त्वे सुभिक्षदुर्भिक्षे (च)।
भावार्थ तत्त्व को त्रिपाद कहा गया है, अर्थात् तत्त्व के द्वारा ही शुभ और अशुभ, जय और पराजय तथा सुभिक्ष और दुर्भिक्ष को जाना जा सकता है।
English Translation – Further Lord Shiva Said, “Tattvas have three aspects- auspicious and inauspicious, victory and defeat & profit and loss. Desired result can be achieved by proper use the knowledge of Tattvas active in the breath as stated earlier.”
श्री देव्युवाच
देव देव महादेव सर्वसंसारसागरे।
किं नराणां परं मित्रं सर्वकार्यार्थसाधकम्।।218।।
अन्वय यह श्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थ भगवान शिव का ऐसा उत्तर पाकर माँ पार्वती ने पुनः उनसे पूछा- हे देवाधिदेव महादेव, सम्पूर्ण भवसिन्धु में मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र कौन है और यहाँ वह कौन सी वस्तु है जो उसके सभी कार्यों को सिद्ध करता है?
English Translation – Thereafter the Goddess again said to Lord Shiva, “O Lord, who is the best friend in the world and by which one can get full success in the life?”
ईश्वर उवाच
प्राण एव परं मित्रं प्राण एव परः सखा।
प्राणतुल्यो परो बंधुर्नास्ति नास्ति वरानने।।219।।
अन्वय यह श्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थ माँ पार्वती को उत्तर देते हुए भगवान शिव ने कहा- हे वरानने, इस संसार में प्राण ही सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा सखा है। इस जगत में प्राण से बढ़कर कोई बन्धु नहीं है।
English Translation – In reply, Lord Shiva said to her, “ O Beautiful Goddess, vital energy (breath) is the best friend of human being in the world and one can get full success in the life by using its knowledge as described in the science of breath (Swaroday Vijnian). There is nothing the most useful in the universe other than this knowledge.”
*******
श्रीदेव्युवाच
कथं प्राणस्थितो वायुर्देहः किं प्राणरूपकः।
तत्त्वेषु सञ्चरन्प्राणो ज्ञायते योगिभिः कथम्।।220।।
अन्वयश्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थमाँ पार्वती भगवान शिव से पूछती हैं- प्राण की हवा में स्थिति किस प्रकार होती है, शरीर में स्थित प्राण का स्वरूप क्या है, विभिन्न तत्त्वों में प्राण (वायु) किस प्रकार कार्य करता है और योगियों को इसका ज्ञान किस प्रकार होता है?
English Translation – Goddess Parvati said to Lord Shiva, “ How does this life force exist in the air, in what form does it exist in the body, how does it work in the Tattvas and how is it known to Yogis?”
शिव उवाच
कायानगरमध्यस्थो मारुतो रक्षपालकः।
प्रवेशे दशाङ्गुलः प्रोक्तो निर्गमे द्वादशाङ्गुलः।।221।।
अन्वयश्लोक अन्वित क्रम में है।
भावार्थभगवान शिव माँ पार्वती को बताते हैं- इस शरीर रूपी नगर में प्राण-वायु एक सैनिक की तरह इसकी रक्षा करता है। श्वास के रूप में शरीर में प्रवेश करते समय इसकी लम्बाई दस अंगुल और बाहर निकलने के समय बारह अंगुल होता है।
English Translation – Lord Shiva said to her, “In the city of this body  breath stands like a soldier to protect it. When the breath enters the body, its length is equal to ten fingers (about seven and half inches) and twelve fingers (about nine inches) at the time of going out.”
गमने तु चतुर्विशन्नेत्रवेदास्तु धावने।
मैथुने पञ्चषष्ठिश्च शयने च शताङ्गुलम्।।222।।
अन्वययह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थचलते-फिरते समय प्राण वायु (साँस) की लम्बाई चौबीस अंगुल, दौड़ते समय बयालीस अंगुल, मैथुन करते समय पैंसठ और सोते समय (नींद में) सौ अंगुल होती है।
English Translation – “At the time of walking its length is twenty four fingers (around eighteen inches), while running forty two fingers (ten and half inches), during intercourse sixty five fingers (about 16.25 inches) and during sleep it goes up to hundred fingers (about 75 inches).”
प्राणस्य तु गतिर्देविस्वभावाद्द्वादशाङ्गुलम्।
भोजने वमने चैव गतिरष्टादशाङ्गुलम्।।223।।
अन्वययह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थहे देवि, साँस की स्वाभाविक लम्बाई बारह अंगुल होती है, पर भोजन और वमन करते समय इसकी लम्बाई अठारह अंगुल हो जाती है।
English Translation – “O Goddess, natural length of breath is equal to twelve fingers (about nine inches), but while eating and vomiting it becomes eighteen fingers (about sixteen and half inches).”
एकाङ्गुले कृते न्यूने प्राणे निष्कामता।
आनन्दस्तु द्वितीये स्यात्कविशक्तिस्तृतीयके।।224।।
अन्वययह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थभगवान शिव अब इन श्लोकों में यह बताते हैं कि यदि प्राण की लम्बाई कम की जाय तो अलौकिक सिद्धियाँ मिलती हैं। इस श्लोक में बताया गया है कि यदि प्राण-वायु की लम्बाई एक अंगुल कम कर दी जाय, तो व्यक्ति निष्काम हो जाता है, दो अंगुल कम होने से आनन्द की प्राप्ति होती है और तीन अंगुल होने से कवित्व या लेखन शक्ति मिलती है।
English Translation – In few verses hereinafter, Lord Shiva describes the benefits of reduced breath length. In this verse it has been indicated that if the length of breath is reduced by one finger, one becomes a man of actions without any desire of gain. When it is reduced by two fingers, he becomes the man of pleasure and its reduction by three fingers makes a man a poet and writer.
वाचासिद्धिश्चतुर्थे च दूरदृष्टिस्तु पञ्चमे।
षष्ठे त्वाकाशगमनं चण्डवेगश्च सप्तमे।।225।।
अन्वययह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थसाँस की लम्बाई चार अंगुल कम होने से वाक्-सिद्धि, पाँच अंगुल कम होने से दूर-दृष्टि, छः अंगुल कम होने से आकाश में उड़ने की शक्ति और सात अंगुल कम होने से प्रचंड वेग से चलने की गति प्राप्त होती हैं।
English Translation – In case of reduction of breath by four fingers, one gets Vak-siddhi, i.e. what he says comes to true. By reducing five finger length of the breath, one becomes far-sighted, six fingers reduction blesses with the capacity of flying in the sky and when it is reduced by seven fingers, one gets power to move with fastest speed from one place to the other.
****
अष्टमे सिद्धयश्चैव नवमे निधयो नव।
दशमे दशमूर्तिश्च छाया चैकादशे भवेत्।।226।।
अन्वय श्लोक अन्वित क्रम में है, अतएव अन्वय की आवश्यकता नहीं है।
भावार्थ यदि श्वास की लम्बाई आठ अंगुल कम हो जाय, तो साधक को आठ सिद्धियों की प्राप्ति होती है, नौ अंगुल कम होने पर नौ निधियाँ प्राप्त होती हैं, दस अंगुल कम होने पर अपने शरीर को दस विभिन्न आकारों में बदलने की क्षमता आ जाती है और ग्यारह अंगुल कम होने पर शरीर छाया की तरह हो जाता है, अर्थात् उस व्यक्ति की छाया नहीं पड़ती है।
English Translation – If the length of breath is reduced eight fingers by yaugic practices, the practitioner acquires eight kinds of yaugic accomplishments (siddhis); if it is reduced by nine fingers, he/she becomes master of nine kinds of treasure; if ten fingers, he becomes competent to change his body in ten different shapes and if it is reduced by eleven fingers, the shadow of his body does not appears on the earth.
द्वादशे हंसचारश्च गङ्गामृतरसं पिबेत्।
आनखाग्रं प्राणपूर्णे कस्य भक्ष्यं च भोजनम्।।227।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ श्वास की लम्बाई बारह अंगुल कम होने पर साधक अमरत्व प्राप्त कर लेता है, अर्थात् साधना के दौरान ऐसी स्थिति आती है कि श्वास की गति रुक जाने के बाद भी वह जीवित रह सकता है, और जब साधक नख-शिख अपने प्राणों को नियंत्रित कर लेता है, तो वह भूख, प्यास और सांसारिक वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।
English Translation – In case the length of breath is reduced by twelve fingers (about nine inches) by yogic practices, the practitioner tastes nectar and becomes immortal and when he becomes able to control his life energy from toes to the top of head, he/she never feels thirst or hunger and becomes free from all kinds of worldly attractions.
एवं प्राणविधिः प्रोक्तः सर्वकार्यफलप्रदः।
ज्ञायते गुरुवाक्येन न विद्याशास्त्रकोटिभिः।।228।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ - ऊपर बताई गई प्राण-विधियाँ सभी कार्यों में सफलता प्रदान करती हैं। लेकिन प्राण को नियंत्रित करने की विधियाँ गुरु के सान्निध्य औरर कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है, विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन मात्र से नहीं।
English Translation – All above said conditions of breath give full success in every work stated therein. But it is not possible by study of different books on spiritual sciences, they are only possible by initiation by a master and his grace.
प्रातःश्चन्द्रो रविः सायं यदि दैवान्न लभ्यते।
मध्याह्नमध्यरात्रश्च परतस्तु प्रवर्त्तते।।229।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ यदि सबेरे चन्द्र स्वर और सायंकाल सूर्य स्वर संयोग से न प्रवाहित हों, तो वे दोपहर में या अर्धरात्रि में प्रवाहित होते हैं।
English Translation – If by the way breath does not flow from left nostril in the morning and from the right nostril at evening, it flows at noon and mid-night respectively.
दूरयुद्धे जयीचन्द्रः समासन्ने दिवाकरः।
वहन्नाड्यागतः पादः सर्वसिद्धिप्रदायकः।।230।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ दूर देश में युद्ध करनेवाले को चन्द्र स्वर के प्रवाहकाल में युद्ध के लिए प्रस्थान करना चाहिए और पास में स्थित देश में युद्ध करने की योजना हो तो सूर्य स्वर के प्रवाहकाल में प्रस्थान करना चाहिए। इससे विजय मिलती है। अथवा प्रस्थान के समय जो स्वर चल रहा हो, वही कदम पहले उठाकर युद्ध के लिए प्रस्थान करने से भी वह विजयी होता है।
English Translation – If someone is desirous of victory in a war at a distant place, he has to start when breath is running through left nostril. But when the place of war is a neighbor country, one must start when breath runs through right nostril or he should take first step of the side through which his breath is passing at the time of start.
यात्रारम्भे विवाहे च प्रवेशे नगरादिके।
शुभकार्याणि सिद्धयन्ति चन्द्रचारेषु सर्वदा।।231।।
अन्वय यह श्लोक भी अन्वित क्रम में है।
भावार्थ यात्रा, विवाह अथवा किसी नगर में प्रवेश के समय चन्द्र स्वर चल रहा हो, तो सदा सारे कार्य सफल होते हैं, ऐसा स्वर-वैज्ञानिकों का मत है।
English Translation – Masters of this science are of opinion that at the time of journey, marriage and entering a city (including a village too), flow of breath through left nostril is always beneficial in all respect.
*****
अयनतिथिदिनेशैःस्वीयतत्त्वे च युक्ते यदि वहति कदाचिद्दैवयोगेन पुंसाम्।
स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्रस्वरेण प्रभवति नहि विघ्नं केशवस्यापि लोके।।232।।
भावार्थ सूर्य अथवा चन्द्रमा के अयन के समय यदि अनुकूल तत्त्व प्रवाहित हो रहा हो, कुम्भक करने मात्र से अर्थात् साँस को रोक लेने मात्र से बिना युद्ध किए विजय मिलती है, चाहे शत्रु कितना भी बलशाली क्यों न हो।
English Translation – During the flow of breath through the left or right nostril suitable Tattva is present, just holding the breath is sufficient to defeat the enemy without any war, whoever and how mighty the enemy is.
जीवं रक्ष जीवं रक्षजीवाङ्गे परिधाय च।
जीवो जपति यो युद्धे जीवं जयति मेदिनीम्।।233।।
भावार्थ जो व्यक्ति अपनी छाती को कपड़े से ढककर जीवं रक्षमंत्र का जप करता है, वह विश्व-विजय करता है।
English Translation – A person who recites the Mantra ‘Jeevam Raksh’ by covering his chest with cloth, he becomes competent to conquer the whole world.
भूमौ जले च कर्त्तव्यं गमनं शान्तकर्मसु।
वह्नौ वायौ प्रदीप्तेषु खे पुनर्न भयेष्वपि।।234।।
भावार्थ जब स्वर में पृथ्वी या जल तत्त्व का उदय हो तो वह समय चलने-फिरने और शांत प्रकृति के कार्यों के उत्तम होता है। वायु और अग्नि तत्त्व का प्रवाह काल गतिशील और कठिन कार्यों के उपयुक्त होता है। लेकिन आकाश तत्त्व के प्रवाहकाल में कोई भी कार्य न करना ही उचित है।
English translation – The breath whether flows through right or left nostril and Prithvi or Jala Tattva is flowing we should walk or undertake work of peaceful nature. When Agni or Vayu Tattva rises in it, we should undertake hard or speed related work. But there is flow of Akash Tattva in the breath, better to avoid any work to undertake.
जीवेन शस्त्रं बध्नीयाज्जीवेनैव विकाशयेत्।
जीवेन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा।।235।।
भावार्थ युद्ध में शत्रु का सामना करते समय जो स्वर प्रवाहित हो रहा हो, उसी हाथ में शस्त्र पकड़कर उसी हाथ से शत्रु पर प्रहार करता है, तो शत्रु पराजित हो जाता है।
English Translation – While fighting in war field with enemies, one should hold the weapon in the hand of the side through which nostril the breath is running and attack on the enemy. Thus he gets victory.
आकृष्य प्राणपवनं समारोहेत वाहनम्।
समुत्तरे पदं दद्यात् सर्वकार्याणि साधयेत्।।236।।
भावार्थ यदि किसी सवारी पर चढ़ना हो साँस अन्दर लेते हुए चढ़ना चाहिए और उतरते समय जो स्वर चल रहा हो वही पैर बढ़ाते हुए उतरना चाहिए। ऐसा करने पर यात्रा निरापद और सफल होती है।
English Translation – At the time boarding in any vehicle we should do so while breathing in and we should take step with the foot of the side through which nostril breath is running. In this way our journey becomes safe and successful.
अपूर्णे शत्रुसामग्रीं पूर्णे वा स्वबलं तथा।
कुरुते पूर्णतत्त्वस्थो जयत्येको वसुन्धराम्।।237।।
भावार्थ यदि शत्रु का स्वर पूर्णरूप से प्रवाहित न हो और वह हथियार उठा ले, किन्तु अपना स्वर पूर्णरूपेण प्रवाहमान हो और हम हथियार उठा लें, तो शत्रु पर ही नहीं पूरी दुनिया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।
English Translation – In case, an enemy holds the weapon to fight when his breath is not flowing in full swing and your breath is flowing fully and you hold the weapon, you will conquer not only the enemy, but even the world if desirable.
*****
या नाडी वहते चाङ्गे तस्यामेवाधिदेवता।
सन्मुखेSपिदिशा तेषां सर्वकार्यफलप्रदा।।238।।
भावार्थ जब व्यक्ति की उचित नाड़ी में उचित स्वर प्रवाहित हो, अभीष्ट देवता की प्रधानता हो और दिशा अनुकूल हो, तो उसकी कभी कामनाएँ निर्बाध रूप से पूरी होती हैं। यहाँ यह पुनः ध्यान देने की बात है कि श्लोक संख्या 75 के अनुसार चन्द्र स्वर (बाँए) की दिशा उत्तर और पूर्व एवं सूर्य स्वर (दाहिने) की पश्चिम और दक्षिण।
English Translation – When breath of a person flows through appropriate nostril, required god is favourable and direction is in conformity of the side through which the breath is flowing, his all desires are fulfilled without any hurdles. Here it is reminded that north and east are related to left nostril breath and right nostril breath to west and south as per verse No.75.
आदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चाद्युद्धं समाचरेत्।
सर्पमुद्रा कृता येन तस्य सिद्धिर्न संशयः।।239।।
भावार्थ युद्ध करने के पहले मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए, तत्पश्चात युद्ध करना चाहिए। जो व्यक्ति सर्पमुद्रा का अभ्यास करता है, उसके कार्य की सिद्धि में कोई संशय नहीं रह जाता।
English Translation – A soldier should practice posture before starting war and then he starts fighting. He, who practices snake posture, undoubtedly he gets success.
चन्द्रप्रवाहेSप्यथ सूर्यवाहे भटाः समायान्ति च योद्धुकामाः।
समीरणस्तत्त्वविदां प्रतीतो या शून्यता सा प्रतिकार्यनाशिनी।।240।।
भावार्थ जब चन्द्र स्वर या सूर्य स्वर में वायु तत्त्व प्रवाहित हो रहा हो, तो एक योद्धा के लिए युद्ध हेतु प्रस्थान करने का उचित समय माना गया है। पर यदि अनुकूल स्वर प्रवाहित न हो रहा हो और सैनिक युद्ध के लिए प्रस्थान करता है, तो उसका विनाश हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।
English Translation – The time, when Vayu tattva is present in the breath whether it is right breath or left breath, is appropriate for a soldier to start for a war. But if Vayu Tattva is not there and he starts for a war, he is killed without any doubt.
यां दिशां वहते वायुर्युद्धं तद्दिशि दापयेत्।
जयत्येव न सन्देहः शक्रोSपि यदि चाग्रतः।।241।।
भावार्थ जिस स्वर में वायु तत्त्व प्रवाहित हो रहा हो, उस दिशा में यदि योद्धा बढ़े तो वह इन्द्र को भी पराजित कर सकता है।
English Translation -
यत्र नाड्यां वहेद्वायुस्तदङ्गे प्राणमेव च।
आकृष्य गच्छेत्कर्णातं जयत्येव पुरन्दरम्।।242।।
भावार्थ किसी भी स्वर में यदि वायु तत्त्व प्रवाहित हो, तो प्राण को कान तक खींचकर युद्ध के लिए प्रस्थान करने पर योद्धा पुरन्दर (इन्द्र) को भी पराजित कर सकता है।
English Translation – If Vayu Tattva is active in the breath of the soldier and he starts for the war by fully breathing in, he can defeat even Indra, the king of gods.
प्रतिपक्षप्रहारेभ्यः पूर्णाङ्गं योSभिरक्षति।
न तस्य रिपुभिः शक्तिर्बलिष्ठैरपि हन्यते।।243।।
भावार्थ युद्ध के समय शत्रु के प्रहारों से अपने सक्रिय स्वर की ओर के अंगों की रक्षा कर ले, तो उसे शक्तिशाली से शक्तिशाली शत्रु भी उसे कोई क्षति नहीं पहुँचा सकता।
English Translation – If a soldier safeguards body parts of the side through which nostril the breath is active, from the enemy attack, then even most powerful enemy cannot harm him.

****







0 comments:

Post a comment